पवनदेव के प्रथम अवतार हैं श्रीहनुमान जी, द्वितीय अवतार हैं श्रीभीमसेन, व तृतीय अवतार हुए श्रीमध्वाचार्य जी।
एक दिन श्रील मध्वाचार्य जी उड़ुपि में समुद्र स्नान के लिये जा रहे थे। आप भगवान श्रीकृष्ण का चिन्तन करते-करते एक बालु की पहाड़ी पर चढ़ गये। आपने देखा कि द्वारिका के बहुत से द्रव्य ले के जा रही एक नौका, पानी व रेत में फंस गयी है।
आपने नौका को बाहर निकल कर किनारे आने का इशारा किया तो नौका स्वतः किनारे पर आ लगी। नाविकों ने जब यह अद्भुत चमत्कार देखा तो वे सब आपका आभार प्रकट करने के लिये कुछ भेंट का निवेदन लेकर आये।
बहुत मना करने पर भी जब वे नहीं माने तो आप नाव में रखा गोपी चन्दन लेने के लिये तैयार हो गये। नाविकों ने गोपी चन्दन का एक बड़ा सा ढेला आपको भेंट स्वरूप दिया। जब आपके बहुत से सेवक उसे उठा कर ला रहे थे, तो बड़वन्देश्वर नामक स्थान पर वह टूट गया, और उसमें से एक बहुत ही सुन्दर बालकृष्ण की मूर्ति प्रकट हो गयी, जिनके एक हाथ में दही मथने वाली मधानी थी और दूसरे हाथ में मधानी की रस्सी।
भगवान बालकृष्ण की ऐसी अद्भुत लीला कि वह मूर्ति इतनी भारी हो गयी कि तीस बलवान लोग मिलकर भी उस मूर्ति को उठा नहीं पा रहे थे। जबकि श्रीमध्वाचार्यजी ने अकेले ही उस भारी मूर्ति को अपने हाथों में उठा लिया और बड़े आराम से उन्हें अपने उड़ुपी मठ में ले आये।
श्रील मध्वाचार्यजी ने बहुत वर्षों तक अपने हाथों से श्रीबालकृष्णजी सेवा की। आज भी दक्षिण भारत के उड़ुपी मठ में भगवान श्रीबालकृष्ण के दर्शन होते हैं।