धन की तीन गति – Three ways of Money

मोहवश संसार के भोगों में फँसाकर जन्म-मृत्यु के चक्कर में डालने वाले पिता-माता तो बहुत होते हैं, परंतु अज्ञान के बन्धन से छूटने का सरल उपाय बतलाने वाले तो आप-सरीखे पिता विरले ही होते हैं।

दक्षिण में पुलिवेंदला के समीप पापघ्नी नदी के तट पर एक छोटे से गाँव में बेंकट नामक एक ब्राह्मण निवास करता था।

ब्राह्मण भगवान् श्रीरंगनाथजी का बड़ा भक्त था, वह दिन-रात भगवान् के पवित्र नाम का जप करता।

ब्राह्मण की पत्नी का नाम था रमाया, वह भी पति की भाँति ही भगवान् का भजन किया करती थी।

माता-पिता मर गये थे और कोई संतान थी नहीं, इसलिये घर में ब्राह्मण, ब्राह्मणी दो ही व्यक्ति थे, दोनों में परस्पर बड़ा प्रेम था, वे अपने व्यवहार-बर्ताव से सदा एक-दूसरे को सुख पहुँचाते रहते थे।

पिता राजपुरोहित थे, इससे उन्हें अपने यजमानों से यथेष्ट धन-संपत्ति मिली थी, वे बहुत ही सदाचारी, विद्वान् भगवदभक्त और ज्ञानी थे।

उन्होंने मरते समय बेंकट से कहा था:-‘बेटा, मेरी पूजा के कमरे से दक्षिण वाली कोठरी में आँगन के बीचों बीच सोने की मोहरों के सात कलश गड़े हैं।

मैंने बड़े परिश्रम से धन कमाया है, मुझे बड़ा दु:ख है कि मैं अपने जीवन में इसका सदुपयोग नहीं कर सका।

बेटा, धन की तीन गति होती है, सबसे उत्तम गति तो वह है कि अपने ही हाथों उसे सत्कार्य के द्वारा भगवान् की सेवा में लगा दिया जाय।

मध्यम गति वह है कि उसे अपने तथा अपनी संतान के शास्त्रविहित सुख भोगार्थ खर्च कर दिया जाय।

और तीसरी अधम गति उस धन की होती है जो न तो भगवान् की सेवा में लगता है और न सुखोपभोग में ही लगता है।

वह गति है उसका दूसरों के द्वारा छीन लिया जाना अथवा अपने या पराये हाथों बुरे कर्मों में खर्च होना।

यदि भगवान् की कृपा से पुत्र सतोगुणी होता है तो मरने के बाद धन सत्कार्य में लग जाता है, नहीं तो वही धन कुपुत्र के द्वारा बुरे-से-बुरे काम- शराब, वेश्या और जुए आदि में लगकर पीढ़ियों तक को नरक पहुँचाने में कारण बनता है।

बेटा, तू सपूत है इससे मुझे विश्वास है कि तू धन का दुरुपयोग नहीं करेगा, मैं चाहता हूँ-इस सारे धन को तू भगवान् की सेवा में लगाकर मुझे शान्ति दे।

बेटा, धन तभी अच्छा है जब कि उससे भगवत्स्वरूप दु:खी प्राणियों की सेवा होती है, केवल इसीलिये धनवानों को भाग्यवान कहा जाता है, नहीं तो, धन के समान बुरी चीज नहीं है।

धन में एक नशा होता है जो मनुष्य के विवेक को हर लेता है और नाना प्रकार से अनर्थ उत्पन्न करके उसे अपराधों के गड्ढे में गिरा देता है।

बेटा, मैं इस बात को जानता था, इसीसे मैंने तुझको आज तक इस धन की बात नहीं बतायी।

मैं चाहता था इसे अपने हाथ से भगवान् की सेवा में लगा दूँ, परंतु संयोग ऐसे बनते गये कि मेरी इच्छा पूरी न हो सकी।

मनुष्य को चाहिये कि वह दान और भजन-जैसे सत्यकार्यों को विचार के भरोसे कल पर न छोड़े, उन्हें तो तुरंत कर ही डाले।

पता नहीं कल क्या होगा, इस ‘कल-कल’ में ही मेरा जीवन बीत गया।

मेरे प्यारे बेंकट, संसार में सभी पिता अपने पुत्र के लिये धन कमाकर छोड़ जाना चाहते हैं, परंतु मैं ऐसा नहीं चाहता।

बेटा, मुझे प्रत्यक्ष दीखता है कि धन से मनुष्य में दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है, इससे मैं तुझे अर्थ का धनी देखकर भजन का धनी देखना चाहता हूँ।

इसीलिये तुझसे यह कहता हूँ कि इस सारे धन को तू भगवान् की सेवा में लगा देना।

तेरे निर्वाह के लिये घर में जो कुछ पैतृक संपत्ति है- जमीन है, खेत है और थोड़ी-बहुत यजमानी है, वही काफी है।

जीवन को सादा, संयमी और ब्राह्मणोचित त्याग से संपन्न रखना, सदा सत्य का सेवन करना और करना श्रीरंगनाथ भगवान् का भजन।

इसीसे तू कृतार्थ हो जायगा और इसीसे तू पुरखों को तारने वाला बनेगा, बेटा मेरी इस अन्तिम सीख को याद रखना।’

बेंकट अपने पिता से भी बढ़कर विवेकी था, उसने कहा:- ‘पिताजी आपकी इस सीख का एक-एक अक्षर अनमोल है, सच्चे हितैषी पिता के बिना ऐसी सीख कौन दे सकता है।

मोहवश संसार के भोगों में फँसाकर जन्म-मृत्यु के चक्कर में डालने वाले पिता-माता तो बहुत होते हैं, परंतु अज्ञान के बन्धन से छूटने का सरल उपाय बतलाने वाले तो आप-सरीखे पिता विरले ही होते हैं।

मुझे यह धन न देकर आपने मेरा बड़ा उपकार किया है, परंतु पिताजी मालूम होता है, मेरी कमजोरी देखकर ही आपने धन की इतनी बुराइयाँ बतलाकर धन को महत्व दिया है।

वस्तुत: धन की ओर भजनानन्दियों का ध्यान ही क्यों जाना चाहिये, धन में और धूल में फर्क ही क्या है?

जो कुछ भी हो-मैं आपकी आज्ञा को सिर चढ़ाता हूँ और आपके संतोष के लिये धन की ओर ध्यान देकर इसे शीघ्र ही भगवान् की सेवा में लगा दूँगा।

अब आप इस धन का ध्यान छोड़कर भगवान् श्रीरंगनाथजी का ध्यान कीजिये और शान्ति के साथ उनके परम धाम में पधारिये।

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