दुख से सदा-सर्वदा के लिए कैसे छूटें…?
हर कोई दुख से छूटना चाहता है, सुख के तलाश में रहता है ।
लेकिन सुख बाजार में मिलने वाली चीज थोड़े है जिसे पैसा देकर खरीदा जा सके-
‘सुख खोजन को जग चला
सुख नहि हाट बिकात।’
सुख के लिए प्रयास करते रहने पर भी सुख नहीं मिलता, अथवा कम मिलता है, जितना चाहिये उतना नहीं मिलता।
और दुख के लिए कोई प्रयास नहीं करता फिर भी दुख मिलता ही रहता है, हर कोई दुखी होता है।
कहते हैं गर्भ में जीव को बहुत कष्ट मिलता है, और उसके बाद जन्म के समय असहनीय पीड़ा होती है, इसी तरह मृत्यु के समय भी असहनीय पीड़ा होती है।
गोस्वामीजी श्री तुलसी दास जी ने कहा भी है:-
“जनमत मरत दुसह दुख होई”
गर्भ के समय और जन्म के समय की पीड़ा किसी को याद नहीं रहती और मर जाने के बाद मरते समय की पीड़ा भी चली जाती है।
लेकिन जन्म और मृत्यु के बीच का समय जो जीवन कहलाता है, इसमें जीव को कितनी पीड़ा होती है।
कभी काम न बनने से, कभी बने हुए काम के बिगड़ जाने से पीड़ा होती है, मनोनुकूल काम न होने से पीड़ा होती है।
कभी किसी के बिछुड़ने से तो कभी किसी के मिलने से पीड़ा होती है, कभी रोग से, कभी शोक-संताप से पीड़ा होती है।
जीवन में पीड़ा अथवा दुख के ना जाने कितने अवसर आते रहते हैं।
यदि जीवन के सुख, शांति के अवसरों की तुलना दुख और अशांति के अवसरों से की जाए तो यही सामने आएगा कि सुख-शांति के अवसर कम और दुख-अशांति के अवसर ही ज्यादा है।
जीवन में भटकाव बहुत है, स्थिरता कम है, ऐसा लगता है जीवन पीड़ा सहने का ही दूसरा नाम है।
बचपन से लेकर अंत तक जीव कितनी बार दुखी होता है क्या कोई गिन सकता है, कितनी बार रोता है, कितनी बार कुछ पाने के लिए तरसता है, या कुछ खोकर रोता है।
आशांति में जीता हुआ शांति की आसा में जीवन समाप्त होता जाता है, फिर बुढ़ापे की पीड़ा जिसे कोई भी नहीं चाहता।
फिर जीवन मिलता है, फिर ऐसे ही जीवन जाता है, इन दुखों से सदा-सदा के लिए छुटुकारा कैसे मिलेगा?
दुख से सदा-सदा के लिए छूट जाने के लिए ही भगवान के शरणागति की जरूरत है, भक्ति की जरूरत है।
साधु, संत और सदग्रंथ कहते हैं कि बिना राम जी से जुड़े जीवन में दुख का अंत नहीं है, भटकाव रुकने वाला नहीं है, सच्ची शांति मिलने वाली नहीं है, इसलिए भगवान राम से जुड़ने की जरूरत है।
सच्चे मन से यदि कोई राम जी से जुड़ जाय तो फिर अशांति कहाँ और दुख कहाँ?
राम जी सारे संसार को विश्राम देने वाले हैं, सही विश्राम तो रामजी की शरणागति से ही मिल सकती है और कोई उपाय नहीं है।
॥ जय श्री सीताराम ॥